Wednesday, December 23, 2015

हमारे पास...

हमारे पास...
.................
भीड़ है
संगठन नहीं
वोट की शक्ति है
सत्ता नहीं
विचार हैं
साहित्य नहीं
ख़बरें है
अखबार नहीं
सुर्खियां हैं
मिडिया नहीं
साधन है
संसाधन नहीं
श्रम है
व्यापार नहीं
कानून है
न्याय नहीं
संविधान है
अधिकार नहीं
भूख है
भोजन नहीं
कदम हैं
पगडण्डी नहीं
मंजिल है
रास्ते नहीं
क्योंकि...
............
पाखंड है
धम्म नहीं
गांधी है
अम्बेडकर नहीं
एक बनो नेक बनो

Monday, December 21, 2015

एक लडका अपने पिताजी से सवाल करता है


 


कुछ जान बची....
एक लडका अपने पिताजी से सवाल करता है....
लडका:- पापा मुझे स्कुल में पढाया की ईन्सान पहेले आदिमानव था. ये सच है क्या ?
पापा:- हां बेटा , ईन्सान पहेले आदिमानव था.
लडका:- फिर तो वो शरीर पर कपडे नही पहनते होगे.?
पापा:- नही बेटा, ईन्सान के जीवन मे धीरे-धीरे प्रगती हुई. ईन्सान थोडा थोडा समझने लगे तब पहेले पेड के पत्तो के कपडे पहनने लगे फिर जेसे जेसे उसे समझ आने लगा वेसे वो सूधरता गया ओर अनेक शोध करता गया. अभी जो कुछ भी हम देख रहे है, उपयोग कर रहे है, वो सब कुछ ईन्सान ने ही निर्माण किया है.
लडका:- पापा तो फिर' भगवान पहले थे कि ईन्सान.?
पापा:- बेटा भगवान पहले थे' भगवान दुनिया बनाई है...
लडका:- फिर पापा एसा केसे. वो भगवान की तस्वीर में तो कपडे, दागीने, त्रिशूल, सोना, भाले, गदा, लड्डू , मोदक, एसे बहुत कुछ-कुछ दिखता है.?
वो समय दागीने बनाने वाला सुनार था क्या ?
कपडे की मील थी क्या?
कपडे की सिलाई के लिये दरजी था क्या ?
भाले, त्रिशूल, गधे, तलवार बनाने वाले कारीगर थे क्या ?
लड्डू मोदक बनाने वाले हलवाई थे क्या ?
पापा:-पागलो जेसे सवाल पूछ मत , चुप बेठ !
अरे बेटा, वो भगवान है. वो कुछ भी कर सकते है...
लडका :- तो भगवान कहाँ है पापा ?
पापा:- अरे भगवान हमारी आजुबाजु ही है.
लडका:- क्या' भगवान हे यहा-?
पापा :- हा बेटा.
लडका:-तो उन्हे कहो ना शेर-हिरन की चामडी के कपडे पहनने से अच्छा प्रगत कपडे पहने....त्रिशूल भाले गदा तलवार से अब कोई नही डरता , उन्हसे कहो रायफल" मशीनगन" ओर आँटोम बोम्ब" पास रखे...
वैसे तो' जिसने दुनिया बनाई है' जिनकी शाप वाणी मे इतनी ताकत है तो उन्हे गदा तलवार की जरूर क्या है पापा ?
वो तो दयालू ओर क्षमाशील है...?
ओर एक पापा, उन्हे कहो अपने देश का भ्रष्टाचार मिटाने ? किसानो की समस्यावो का समाधान करने, उनकी आत्महत्या रोकने को, 2 साल की छोटी लडकी से 60 साल की ओरत पर रोजाना बलात्कार होते है. वो रोकने को कहो ना . मंदिरो में करोडो-अरबो की संपत्ती है वो लोक कल्यान के लिये देने की बुद्धी वो मंदिर प्रशासन वालो को दे वो कहो ना पापा....
पापा:- बेटा मे तेरे हाथ जोड्ता हुं' बस कर तेरे सवाल. मुझे अब तक नही पता. तो मे तुझे क्या जवाब दु..
मझे बच्चपन से जेसा भगवान दिखाया जेसा धर्म शिकाया वेसे ही पूजा ओर पालन करता आया...
मुझे ये सब नही पता बेटा...पर सब पालन करना पडता है बेटा...नही अच्छा लगता है फिर भी चुप बेठना पडना है..
लडका:-यानी आज तक आपने अपनी बुद्धी ओर धैर्या का उपयोग नही किया. पर पापा मे वेसा करूगा नही . सत्य-असत्य जान के ही आगे जाउगा .पर मुझे इतना विश्वास जरूर है. ये सृष्टी का निर्माता जेसे हो वेसे हो , पर सबी धर्म शिखाता है वेसे बिलकुल नही...
ये सुन के पापा का सर नीचे झूक गया ओर लडके से नजर चुराने लगा.
आज कम संख्या मे हो पर , कभी ना कभी आगे की पिढी के लडके ये सवाल जरूर पूछेगे ध्यान रखो. तब सर झुकाने से अच्छा अभी अपनी गलती सुधार ले. सभी करते ईसलिये मत करो, काम के कारन अच्छा लगे तो ही वो चीज करो..
खुद: को सवाल करो...आगे की वैज्ञानिक पिढी तैयार करो...
जय भिम महान..
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A boy asks his dad

Thursday, December 17, 2015

भारत के मूल निवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक या राक्षस कहा गया

आर्यों का मूल स्थान सेन्ट्रल एशिया था
आर्य पशु पालन का काम करते थे
आर्य जब भारतीय उप महाद्वीप में आये तो यहाँ घने जंगल थे
आर्यों को गायों के लिए घास के मैदानों की ज़रूरत थी
मैदान तैयार करने के लिए आर्यों नें जंगलों को आग लगानी शुरू करी
इसे आर्य यज्ञ कहते थे
लेकिन भारतीय मूल निवासी जंगल पर आधारित जीवन जीते थे
इसलिए मूलनिवासी जंगल में लगी हुई आग को बुझा देते थे
इसीलिये आर्य कहते थे कि ये राक्षस हमारे यज्ञ में बाधा डालते हैं
भारत के मूल निवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक या राक्षस कहा गया
आर्यों के धर्मग्रंथों में राक्षसों का वर्णन ध्यान से पढ़िए
उसमें लिखा गया है कि राक्षस काले रंग के होते थे
राक्षसों के घुंघराले बाल होते थे
राक्षसों के सींग होते थे
राक्षसों का यह वर्णन ठीक आदिवासियों का वर्णन है
भारत के मूल निवासी सांवले रंग के थे
घुंघराले काले बालों वाले थे
आज भी छत्तीसगढ़ के आदिवासी सींग लगा कर नाचते हैं
यज्ञ की अग्नि की रक्षा के लिए राजा का बेटा जंगल में जाता है
राजा का बेटा ताड़का राक्षसनी का वध करता है
ताड़का यानी ताड़ी पीने वाले समुदाय की महिला
ताड़कासुर यानी पेड़ से निकली ताड़ी पीने वाले असुर
यानी आदिवासी
यानी राजा का बेटा भारत के आदिवासियों की हत्या करता है
उसे आर्य ग्रन्थ वीरता की गाथा के रूप में दर्ज करते हैं
और उस राजा के बेटे को अपना राष्ट्रीय आदर्श घोषित करते हैं
और आज भी हर साल ताड़कासुर वध का उत्सव मनाते हैं
मैं आपको यह पुरानी कहानी इसलिए सुना रहा हूँ
ताकि आप यह समझ सकें
कि हमारे शासन द्वारा
आदिवासियों की आज जो हत्याएं करी जा रही हैं
आप उसे क्यों स्वीकार कर लेते हैं ?
असल में आदिवासियों को मार कर उनकी ज़मीनों पर कब्जा कर लेना
हमारी परम्परा है
इस परम्परा को हम अपना धर्म मानते हैं
उदहारण के लिए दो महीने पहले ही
छत्तीसगढ़ के पेद्दा गेलूर गाँव में
हमारे सुरक्षा बलों नें चालीस आदिवासी औरतों पर यौन हमला किया है
तीन महिलाओं नें सोनी सोरी के साथ आकर थाने में बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाई है
इनमें एक चौदह साल की बच्ची भी है
लेकिन इस घटना के बाद आज किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है
लेकिन इस सब का भारत के सभ्य, शिष्ट, और महान संस्कृति के वाहकों के मन में ज़रा सा भी रोष नहीं है
सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भरने पुलिस अधिकारी को भारत के राष्ट्रपति नें वीरता पुरस्कार दिया
उडीसा की आरती मांझी के साथ सुरक्षा बलों नें सामूहिक बलात्कार किया और उसे पांच फर्जी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया
आरती मांझी पाँचों मामलों में निर्दोष पायी गयी
लेकिन आज तक उसके साथ बलात्कार करने वाले किसी सिपाही के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करी गयी
पन्द्रह साल की आदिवासी लडकी हिडमे के साथ थाने में बलात्कार कर के उसे सात साल तक जेल में रखा गया और फिर इसी साल उसे निर्दोष घोषित कर के घर भेज दिया
आदिवासी महिला लेधा के साथ पुलिस वालों नें एक महीने तक सामूहिक बलात्कार किया
ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारी कल्लूरी को भी
भारत के राष्ट्रपति नें वीरता पुरस्कार दिया
आप कह सकते हैं कि मैं क्यों अतीत का रोना रोने बैठ गया हूँ
बेशक हम अपना वर्तमान बेहतर बना सकते हैं
लेकिन उसकी शुरुआत तो कीजिये
पिछली गलती स्वीकार कर लीजिये
सही रास्ते पर चलने के लिए सहमत हो जाइए
भारत में भी शांति और प्रेम का वातावरण बन सकता है
वरना हमारी नफरत और लालच हमें भयानक हालात में पहुंचा ही देगी
और उसके लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं हम खुद ही होंगे
( संदर्भ स्रोत - वोल्गा से गंगा - लेखक राहुल संकृत्यायन, वयं रक्षामः - लेखक आचार्य चतुरसेन, सामाजिक विज्ञान की छठवीं ,सातवीं और आठवीं की इतिहास की एनसीआरटी की पाठ्य पुस्तक )
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Native to India as forest guards or monsters so they were used to protect

Tuesday, October 27, 2015

गोभक्त स्वामीजी

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए. ऊंचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे. पांवों में खड़ाऊं. हाथ में सुनहरी मूठ की छड़ी. साथ एक छोटे साइज का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफी के गाने के सुनवा रहा था.
मैंने पूछा- स्वामी जी, कहां जाना हो रहा है?
स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
मैंने कहा- स्वामीजी, मेरी काफी उम्र है, आप मुझे ‘बच्चा’ क्यों कहते हैं?
स्वामीजी हंसे. बोले – बच्चा, तुम संसारी लोग होटल में साठ साल के बूढ़े बैरे को ‘छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को बच्चा कहते हैं. यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो. इसीलिए हम तुम्हें बच्चा कहते हैं. बुरा मत मानो. संबोधन मात्र है.
स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.
कहने लगे- बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.
मैंने कहा- स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?
स्वामीजी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.
मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?
वे बोले- विधर्मी कसाई.
मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?
स्वामीजी ने कहा- सो तो है. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.
मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!
स्वामीजी मेरी तरफ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हजारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.
स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूं.
स्वामीजी और बच्चा की बातचीत
स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?
नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.
तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?
हां, बच्चा, लगभग सभी.
तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.
यानी भैंस को हम माता…नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.
स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों जोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई खास बात है क्या?
बच्चा, जब चुनाव आता है, तब हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देश की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मजा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहां जा रहे हो?
स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूं.
यह क्या होता है, बच्चा?
स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूं, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.
पर मनुष्य को कौन मार रहा है?
इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महंगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफाखोर मार रहा है, काला-बाजारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहां मनुष्य को मार रही है. बिहार के लोग भूखे मर रहे हैं.
बिहार? बिहार शहर कहा है बच्चा?
बिहार एक प्रदेश है, राज्य है

Sunday, October 25, 2015

Reason of Poor and unhappiness

 महीने का सन्देश सूत्र: गौतम बुद्ध ने सर्वप्रथम साबित किया था की 'आर्थिक विषमता' या असमान मेहनताना ही दुखों का मूल कारन है,आर्थिक विषमता का मतलब है ऐसी व्यस्था जिसमें व्यक्तियों के काम की कीमत अन्यायपूर्ण तरीके से तय हो जिससे कुछ लोग बहुत ज्यादा अमीर हो जाएँ और बहुसंख्यक लोग लोग बहुत गरीब बन जाएँ | इसका सीधा कारण है कुछ अमीर लोगों का समूह जो सरकार के नियंत्रण, ईश्वर का डर और धर्म की इस्तेमाल से जनता का शोषण करता है| जनता जितना ज्यादा धर्म और ईश्वर को चाहेगी उतनी ही गरीब और दुखी होती जाएगी| अगर दुखों से मुक्ति चाहते हो तो ईश्वर की जगह ज्ञान और धर्म की जगह राजनीती और भक्ति की जगह संगर्ष में लगन लगाओ, ताकि तुम भी सरकारी नीतिओं का नियंत्रण कर सको| 

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Tuesday, September 1, 2015

‎जमीन खरेदी करताना‬

महत्त्वाची माहिती…….
1. जमीन खरेदी करताना घ्यावयाची काळजी
2. जमिनीचा सातबारा आपल्या नावे केव्हा होतो
3. व्यावहारिक जगात लागणारे काही महत्वाची जमिनीची क्षेत्रफळाची रुपांतरे
====================================================
1. ‪#‎जमीन_खरेदी_करताना‬
1) जमिनीचा सातबारा उतारा पाहणे :
ज्या गावातील जमींन खारेदी करावयाची असेल तेथिल गावच्या तलाठ्या कडून जमिनीचा नवीन सातबारा काढून घ्यावा. त्यावर असलेले फेरफार व आठ अ तपासून पाहावा.
सातबारा पहाताना वर्ग १ नोंद असली तर ती जमीन विक्री करणा-याची स्वतःच्या मालकी वहिवाटीची असून सदर जमीन खरेदी करण्यास विशेष अडचण येत नाही.
परंतु नि.स.प्र.(नियंत्रित सत्ता प्रकार किवा वर्ग २) अशी नोंद असेल तर सदर जमीन कुळ वाहिवाटी मार्फत मिळविलेली असते. अशी जमीन खरेदी करणे पूर्वी संबंधित कुळाला विक्री करण्यासाठी प्रांत अधिकारी यांची परवानगी घेणे अपरिहार्य ठरते. ही परवानगी खरेदी करते वेळी घेणे आवश्यक असते. या करीता ३२ म प्रमाणपत्र वगैरे ब-याच कागदपत्रांची पूर्तता करावी लागते. यासाठी साधारणत: एक महिना कालावधी लागतो. प्रांत अधिकारी यांची परवानगी मिळल्यावर खरेदीखत करता येते.
2) कोणतीही जमीन खरेदी करताना खालील गोष्टींचा आढवा घ्यावा.
a) जमिनी पर्यंतचा रस्ता - जमीन बिनशेती असल्यास जमिनी पर्यंतचा रस्ता नकाशामध्ये दाखवीलेला असतो परंतु जमीन बिनशेती नसल्यास व खाजगी रस्ता असल्यास रस्त्यासाठी दाखवीलेली जमीन व संबंधित मालक यांची हरकत नसल्याची खात्री करावी.
b) आरक्षीत जमिनी - शासनाने सदर सदर जमिनी मध्ये कोणत्याही करणासाठीचे आरक्षण उदा. हिरवा पट्टा पिवळा पट्टा इं. नसल्याची खात्री करावी.
c) वाहिवाटदार - सातबारावरील मुळ मालक व प्रत्यक्ष जमिनीचा वहिवाटदार वेगवेगळे असू शकतात याची खात्री कारावी.
d) सातबारावरील नावे - सातबारावरील नावे ही विक्री करन-या व्यक्तीचिंच आहे का ते पहावे. त्यावर मयत व्यक्ती किवा जुना मालक इतर वारसांची नावे असल्यास ती काढून घेणे आवश्यक असते.
e) कर्जप्रकरण, नयालयीन खटला व भाडेपट्टा - जमिनीवर कोणत्याही बॅंक किवा संस्था यांच्या कर्जाचा बोजा नसल्याची खात्री करावी. तसेंच न्यायालायीन खटला चालू असल्यास संदर्भ तपासून पहावे.कोणतीही जमीन खरेदी करताना प्रथम वकिलाचा सल्ला घेणे आवश्यक आहे.
f) जमिनीची हद्द - जमिनीची हद्द नकाशा प्रमाणे मोजून तपासून घ्यावी.व लगतच्या जमीन मालकांची हरकत नसल्याची खात्री करावी.
g) इतर अधिकारांची नोंद - सातबारावर इतर अधिकारमध्ये नावे असतील तर आवश्यक ती माहिती करूं घेणे. किवा बक्षीसपत्राने मिळलेल्या जमिनींची विशेष काळजी घ्यावी.
h)बिनशेती करणे - शेतघर सोडून कोणत्याही कारणासाठी बांधकाम करावयाचे असल्यास बांधकामाच्या प्रकारा प्रमाणे बिनशेती करणे आवश्यक असते शहरात असल्यास तूं प्लानिंग प्रमाणे करवी.
i) संपादित जमिनी - सदर जमिनीमधून नियोजित महामार्ग, रेल्वे मार्ग, तलाव इ. नसल्याची खात्री करावी. याची सातबारावर नोंद पहावी. तसेच जमिनियाच्या बाजून रस्ता, नदी, महामार्ग, असेळ तर त्यापासूनचे योग्य अंतर सोडून पुरेशी जमीन असल्यास खरेदी करावी.
j) खरेदीखत - तालुक्यातील दुय्यम निबंधक कार्यालयामध्ये आवश्यक त्या कागदपत्रांची पूर्तता करून व आवश्यक शुल्क भरून खरेदीखत करावे.
योग्य कालावधी नंतर खरेदी केलेल्या जमिनिचा नकाशा व आपल्या नावे सातबारा खात्री करावी
3) वेळोवेळी बदलणारे शासन नियम पडताळून पहावेत.
4) जमीन खरेदी देतांना:
जमिन मालकाने आर्थिक व्यवहार पूर्ण झाल्याशिवाय खरेदीखत करू नये. खरेदीखत करताना दिलेली जमीन व सातबारा यांची खात्री करावी.
====================================================
2.जमिनीचा सातबारा आपल्या नावे केव्हा होतो ?
खरेदीखत जमीन विक्री केल्यानंतर होते. खरेदीखत झाल्यानंतर काही दिवसातच दुय्यम निबंधक कार्यालयातून अविवरण पत्रक
तहसीलदार कार्यालयात पाठविले जातात. त्यानंतर संबधित तलाठी कार्यालयात हे विवरण पत्रक पाठविले जातात.
त्यानंतर तलाठी सातबारावारील सर्वांना नोटीसा काढतात. नोटीस सही करून अल्यानंतर सातबारावरील जुनी नावे कमी होऊन
नवीन मालकाची नावे नोंदाविली जातात.
वर्ग २ च्या विक्रीची परवानगी
सातबारावर जमिनिचा प्रकार यामध्ये वर्ग १ असा उल्लेख असेल तर प्रांत अधिकारी यांची परवानगीची आवश्यकता नसते,.
परंतु वर्ग २ असे असल्यास परवानगीची आवश्यकता असते. कारण अशा जमिनी भोगवटदाराला केवळ कसण्याचा
अधिकार असतो विकण्याचा नसतो. सदर भोगवटदार हा या जमिनिचा कुळ म्हणून असतो हि जमीन कुळकायदयाने
मिळालेली असते थोडक्यात या जमिनी म्हणजे सरकारी मालमत्ता असतात.
अशा जमिनीच्या विक्रीच्या परवानगी साठी प्रांत ऑफिंस मध्ये खालीअल कागदपत्रांची पुर्तता करावी लागते.
१. जमिनीचा नवीन सातबारा
२. जमिनीवरील सर्व फेरफार
३. आठ अ
४. जमीनीचा नकाशा
५. अर्ज
अर्जासोबत सर्व कागदपत्रांच्या झेरॉक्स प्रती जोडून प्रांत ऑफिस मध्ये दाखल करावेत. सर्व कागदपत्रांची
छाननी करून एका महिन्यात प्रांत ऑफिसरच्या पर्वांगीची प्रत मिळते. मिळालेल्या परवनगी मध्ये फक्त सहा महिन्याचा
कलावधी असतो. सहा महिन्यात जमीन विक्री करावी लागते अथवा सहा महिन्यांनी हि परवानगी संपते.
बिनशेती (Non Agricultur)
कोणत्याहि जमिनी मध्ये घर बांधावयाचे झाल्यास ती जमीन प्रथम बिनशेती करावी लागते. शेत जमीन किवा इतर
कोणत्याही प्रकारच्य जमिनीमध्ये घर बांधता येंत नाही.
जर शेत घर बांधावयाचे असल्यास स्वतः शेतकरी असावे लागते. त्याचप्रमाणे आपल्या शेत जमिनी असाव्या लागतात
आणि ती शेती करावी लागते. आणि तसे पुरावे असावे लागतात.
जमीन बिनशेती करायची असल्यास पुढील कागदपत्रांची आवश्यकता असते.
१ जमिनीचा सातबारा
२ जमिनिचा नकाशा
३ टाउन प्लानिंगची परवानगी
४ अर्ज
सदर अर्जासोबत सर्व कागदपत्रे जोडून संबधित प्रांत अधिकारी कीवा तहसीलदार यांच्या कार्यालयात सदर करावे लागतात.
जमिनीच्या नकाशामध्ये लागून रस्ते असल्यास अडचण येंत नाही पण तसे नसेल तर घरापर्यंत जण्याकरीता रस्ता दाखवावा
लगतो. म्हणजेच सदर जमनीपर्यंत जाण्यासाठी रस्त्यासाठी जमीन विकत घ्यवी लागते.
खरेदीखत कसे करावे;
खरेदीखत म्हणजे जमिनीचा व्यवहार पूर्ण केल्याच पुरावा असतो.
खरेदिखत करण्यापूर्वी जमीन खरेदी करणार्‍याने जमीन मालकाला ठरलेल्या व्यवहाराप्रमाणे सर्व रक्कम पूर्ण करायची असते.
जर सर्व रक्कम पूर्ण झाली नसेल तर खरेदीखत करू नये. कारण एकदा खरेदीखत झाले की नंतर जमीन मालक हा त्या
जमिनीवरचा मालकी हक्क काढून घेत असतो. आणि खरेदीखत सहजासहजी रद्द होत नाही. रद्द करण्याचा अधिकार फक्त
सर्वोच्च न्यायालयाला असतो. पण तसे मोठे पुरावे असावे लागतात. खरेदीखताची नोंदणी संबंधित दुय्यम निबंधक कर्यालयात
झाल्यानंतर काही दिवसातच सातबारा नवीन मालकाच्या नावे होतो.
खरेदीखत करण्यासाठी ज्या गावातील जमीन असेल त्या संबधित दुय्यम निबंधक कार्याकायात जाऊन बाजारभावे आणि आपपसातील
ठरलेल्या रक्कमेवर मुल्यांकन करून मुद्रांकशुल्क काढून घ्यावे.
जमिनीचे मुल्यांकन हे जमिनीच्या प्रकाराप्रमाणे ठरलेले असते. आणि त्याचे सर्व दरपत्रक (रेडीरेकनर) त्या त्या तालुक्याच्या
दुय्यम निबंधक अधिकारी यांच्या कार्यालयात उपलब्ध असतात. आणि मुल्यांकन काढून देण्याचे काम हे दुय्यम निबंधाकाचेच असते.
यामध्ये जमिनीची सरकारी किंमत आणि प्रत्यक्ष जमीन मालक व खरेदीदार यांच्यातील ठरलेल्या व्यवहारावर जी रक्कम जास्त
असते त्यावर मुल्यांकन करून जास्त मुद्रांकशुल्क गृहीत धरला जातो.
मुद्रांकशुल्क काढून झाल्यावर दु.नि. हे खरेदीखत दस्तऐवजासाठी लागणारे नोंदणीशुल्क व कागदपत्रे व इतर कार्यालयीन खर्चाची माहिती देतात.
हि सर्व माहिती घेऊन दु. नि. यांनी ठरवून दिलेल्या मुद्रांकशुल्कावर आवश्यक ती माहिती लिहून उदा. सर्वे नं. जमिनीचे क्षेत्र,
जमिनीचा प्रकार, जमीन मालकांची नावे, जमीन खरेदी करण-याचे प्रयोजन त्याचप्रमाणे जमीन विकण्याचे प्रयोजन नमूद करावे लागते.
तसेच लागणारी सर्व कागदपत्रे जोडून खरेदीखत तयार करावे. यासोबत संगणकावर डाटाएंट्री करण्यसाठी लागणारा input भरून
दुय्यम निबंधक कार्यालयात दस्त नोंदणीसाठी सदर करावा.
खरेदीखतासाठी लागणारी कागदपत्रे --
१) सातबारा
२) मुद्रांकशुल्क
३) आवश्यक असल्यास फेरफार
४) आठ अ
५) मुद्रांक शुल्काची पावती
६) दोन ओळखीच्या व्यक्ती, त्यांचे फोटो प्रुफ
७) आवश्यक असल्यास प्रतिज्ञापत्र
८) N A order ची प्रत
९) विक्री परवानगीची प्रत
====================================================
3. व्यावहारिक जगात लागणारे काही महत्वाची ‪#‎जमिनीची_क्षेत्रफळाची‬ रुपांतरे ;
१ हेक्टर = १०००० चौ. मी .
१ एकर = ४० गुंठे
१ गुंठा = [३३ फुट x ३३ फुट ] = १०८९ चौ फुट
१ हेक्टर= २.४७ एकर = २.४७ x ४० = ९८.८ गुंठे
१ आर = १ गुंठा
१ हेक्टर = १०० आर
१ एकर = ४० गुंठे x [३३ x ३३] = ४३५६० चौ फुट
१ चौ. मी . = १०.७६ चौ फुट
७/१२ वाचन करते वेळी पोट खराबी हे वाक्य असत—त्याचा अर्थ पिक लागवडी साठी योग्य नसलेले क्षेत्र —परंतु ते मालकी हक्कात मात्र येत!!!!!
नमुना नंबर ८ म्हणजे एकूण जमिनीचा दाखला या मध्ये अर्जदाराच्या नावावर असलेली त्या विभागातील [तलाठी सज्जा] मधील जमिनीचे एकूण क्षेत्र याची यादी असते!!!!
जमिनी ची ओळख हि त्याच्या तलाठी यांनी प्रमाणित केलेली आणि जागेशी सुसंगत असलेल्या चतुर्सिमा ठरवितात!!!!