जब्बार पटेल ने डाॅ.बाबासाहब अंबेडकर यह फिल्म बनाकर बहुजन समाज को की गुमराह करने की कोशिश
महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार ने जब्बार पटेल को पकडकर सन 2000 मे एक फिल्म बनाई थी जिसका नाम डाॅ.बाबासाहब अंबेडकर था। इस फिल्म में बाबासाहब का किरदार दक्षिण भारत के अभिनेता ममूटी इन्होंने निभाया था। बहोत से लोगों ने इस फिल्म की बहोत प्रशंसा की थी लेकिन हमे यह नही पता था की जब्बार पटेल ने बाबासाहब अंबेडकर जी इनके चरित्र को तोड मरोडकर दिखाया था। तो आईए जानते हैं की आखिर जब्बार पटेल ने बहुजन समाज को गुमराह करने के लिए फिल्म में बाबासाहब अंबेडकर जी इनको कैसे दिखाया था।
ध्यान मे रखिए इस फिल्म के डायरेक्टर जब्बार पटेल यह 'राष्ट्र सेवा दल' की पार्श्वभूमि से आए हुए हैं। जब्बार पटेल जवानी मे 'राष्ट्रसेवा दल' मे काम करते थे।
1) फिल्म में देखिए:- बाबासाहब अंबेडकर जी की फिल्म में अमेरिका में विद्यार्जन के समय जो दृश्य हैं उसमें वेटर बनने का दृश्य हैं, वहाँ एक निग्रो आदमी के साथ संवाद दिखाया गया हैं। वह निग्रो भी वहाँ वेटर का काम कर रहा था। वह निग्रो बाबासाहब अंबेडकर जी को कहता हैं की, " कुछ भी क्यों न हो तुम लोगों को पढ़ने का तो अधिकार हैं मुझे तो पढ़ने का भी अधिकार नही हैं।"
यह संवाद लिखनेवालें ने ऐसा संवाद दिखाकर यह संदेश देने की कोशिश की, की " अन्याय केवल भारतीय अछूतों के साथ ही नही होता अन्याय धरती पर हर जगह होता है।" अन्याय भारत के अछूतों के साथ ही नही दुनिया में और जगह अन्याय होता हैं। निग्रो के साथ अमेरिका में जो अन्याय होता हैं उसकी तुलना में अछूतों के साथ भारत में जो अन्याय ब्राह्मण करते हैं वह तो कुछ भी नही हैं अमेरिका में तो ज्यादा अन्याय होता हैं। ऐसा दृश्य दिखाकर स्क्रिप्ट लिखनेवालों ने यह संदेश देने की कोशिश की, की ब्राह्मण उतने ज्यादा अन्यायकारी नहीं हैं जितना की उन्हें अन्यायी और अत्याचारी समझा जाता हैं।
2) एक सीन मे बाबासाहब अंबेडकर लायब्रेरी से बाहर आ रहे हैं तो उस वक्त एक अंग्रेज व्यक्ति एक निग्रो को सडक सड़क पर पीट रहा हैं और बाबासाहब अंबेडकर जी चूपचाप देख रहे हैं यह सीन बहोत देर तक चल रहा हैं। उस निग्रो को एक अंग्रेज मार रहा हैं, उसे गालियाँ दे रहा हैं, उसके उपर अन्याय कर रहा हैं और बाबासाहब अंबेडकर जी वहा चूपचाप खड़े हैं क्या यही बाबासाहब अंबेडकर जी इनकी छवी थी। बाबासाहब अंबेडकर जी तो अन्याय बर्दाश्त नही करते थे बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे। यह दृश्य दिखाकर बाबासाहब अंबेडकर जी इनकी छवी खराब करने की कोशिश की हैं।
3) महाड के चवदार तालाब के सत्याग्रह का दृश्य फिल्म में दिखाया गया हैं। उस दृश्य में एक बात बताई गई हैं की वहाँ चितले नाम का कोई ब्राह्मण हैं। उस वक्त मनुस्मृति जलाने का प्रस्ताव वह ब्राह्मण करता हैं। उस दृश्य में चितले कहता हैं, " वैसे तो जन्म से मैं ब्राह्मण हूँ, फिर भी मैं मनुस्मृति का घोर निंदक हूँ।" यानी उस फिल्म में मनुस्मृति जलाने का श्रेय चितले नामक ब्राह्मण व्यक्ति को दिया गया हैं।
4) महाड के ब्राह्मण लोगों ने महाड के चवदार तालाब के बारे में बम्बई कोर्ट में केस दायर किया था, मगर फिल्म बनाने वाले ने फिल्म में यह डायलाॅग लिखा की, 'महाड के सवर्ण ने कोर्ट मे दावा दाखिल किया हैं'। यानी फिल्म में ब्राह्मणों को बचाने के लिए 'ब्राह्मण शब्द की बजाय 'सवर्ण' शब्द का ईस्तेमाल किया गया। आप एक बात पर गौर किजीए अगर श्रेय लेना हो तो चितले को ब्राह्मण बताया गया और जिन्होंने सत्याग्रह के खिलाफ केस दायर किया वे ब्राह्मण होकर भी उनके लिए सवर्ण शब्द का ईस्तेमाल किया गया।
5) एक दृश्य में बाबासाहब अंबेडकर जी पढ़ रहे हैं वहाँ लाला लाजपत राय बाबासाहब अंबेडकर जी को आकर कहते हैं कि आप आजादी के आन्दोलन में शामिल हो जाओ, उनके जो प्रोफेसर हैं वह भी उनको यही कहते हैं, बाबासाहब अंबेडकर जी इससे इनकार करते हुए कहते हैं कि, मैं आजादी के इस आंदोलन ने शामिल नहीं हो सकता क्योंकि मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ। यह बात सत्य हैं लेकिन यह दृश्य दिखाने का मतलब कुछ और था। वह यह हैं की बाबासाहब अंबेडकर जी स्वतंत्रता के आंदोलन में शामिल नही थे।
6) पूना पैक्ट का एक दृश्य फिल्म में दिखाया गया हैं उस दृश्य में गांधी और बाबासाहब अंबेडकर जी का जो संवाद दिखाया गया हैं उस संवाद में बाबासाहब अंबेडकर जी को गांधी को बापू बोलते हुए दिखाया गया हैं जबकि बाबासाहब अंबेडकर जी ने गांधी को कभी बापू नही कहाँ उन्होंने सदैव गांधी को "मिस्टर गांधी" या गांधीजी कहाँ।
याद रखिए बाबासाहब अंबेडकर जी इन्होंने 1955 में बी.बी.सी.वर्ल्ड को एक मुलाकात दी थी उस मुलाकात के दौरान बी.बी.सी. पत्रकार ने बाबासाहब अंबेडकर जी को एक सवाल पुछा था वह सवाल यह था:-
बी.बी.सी. पत्रकार:- क्या आपको लगता हैं की गांधी का बरताव एक दुष्ट राजनेताओं जैसा था?
बाबासाहब अंबेडकर:- हाँ! किसी दुष्ट राजनेता जैसा ही!! वे कभी महात्मा नही थे। मैं उनको महात्मा कहने के खिलाफ हूँ। मैंने अपने पुरे जिवन में उन्हें कभी महात्मा नही कहा। वह उपाधी उन्हें शोभा नही देती। नैतिकता से भी वे महात्मा कहने के लायक नही हैं।
बाबासाहब अंबेडकर जी खुद कहते हैं की मैंने गांधी को कभी महात्मा कहाँ नही तो फिर फिल्म में बाबासाहब अंबेडकर जी इनको गांधी को महात्मा कहते हुए क्यों दिखाया गया? इसके पिछे भी एक साजिश हैं।
7) बाबासाहब अंबेडकर जी 24 सितम्बर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करते हैं और उसके बाद फिल्म में यह दृश्य दिखाया गया की बाबासाहब अंबेडकर जी 25 सितम्बर को बम्बई मे एकांत में बैठे हैं, कमरा अंधेरे से ढँका हुआ हैं, उसमें अकेले ही चिंता में बैठे हैं। मगर वास्तव मे बाबासाहब अंबेडकर जी 25 सितम्बर को बम्बई मे बैठे हुए नहीं थे बल्कि 24 सितम्बर को पुना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर 25 सितम्बर को बम्बई के चैम्बर ऑफ काॅमर्स में पुना पैक्ट के विरोध में भाषण करते हैं। अगर यह बात और भाषण फिल्म में होता तो असलियत सामने आ जाती।
8) बाबासाहब अंबेडकर जी इनको एक दृश्य में कुछ अंग्रेज छात्राओं के साथ मटन खाते हुए दिखाया गया हैं उसके पिछे भी बड़ी साजिश की गई हैं। वह साजिश यह हैं की बौद्ध धम्म में किसी भी पशु या प्राणी की हत्या करना गलत माना जाता हैं। यह दृश्य दिखाकर यह बताया गया की बौद्ध धम्म में यह सब होने के बावजूद बाबासाहब अंबेडकर जी मटन क्यो खाते हैं? उसी दृश्य में एक अंग्रेज छात्र उसे मटन न मिलने की वजह से वो बाबासाहब अंबेडकर जी इनको भारतीय लोग बाएँ हाथ का कैसे ईस्तेमाल करते हैं यह बताते हुए दिखाया गया हैं। इसका मतलब की बाबासाहब अंबेडकर जी इनके साथ भारतीय ब्राह्मणों ने ही नहीं बल्कि अंग्रेज छात्रों ने भी बदसलुखी की थी और उसी अंग्रेजों के मंत्रिमंडल में और उन्हीं अंग्रेजों के बाबासाहब अंबेडकर जी समर्थक थे ऐसा अप्रत्यक्ष रूप से दिखाया गया।
9) फिल्म में माता रमाई के परिनिर्वाण का एक दृश्य दिखाया गया हैं। पार्थिव शरिर के पास बैठे हुए बाबासाहब अंबेडकर जी जब यह देखते हैं की रमाबाई को हरे रंग की साड़ी पहनाई गई हैं तब वे अपने लोगों से कहते हैं की, " उसकी आखिरी इच्छा तो सफेद साड़ी पहनने की थी, आगे डायलाॅग लिखने वाले ने लिखा की, ' परंपरा तो हरी साड़ी पहनने की हैं' तो बाबासाहब अंबेडकर जी इनको सिर हिलाते हुए दिखाया गया। फिल्म बनानेवालों का एक ही उद्देश था की, बाबासाहब अंबेडकर जी प्रथा और परंपरा के आगे झुकते थे और बाबासाहब अंबेडकर जी ने प्रथा परंपरा विरोध में जो आंदोलन चलाया वह महज एक ढोंग था।
10) बाबासाहब अंबेडकर जी इनको संविधान सभा में पहुँचाने का श्रेय गांधी को देने का प्रयास फिल्म के किया गया हैं।
11) बाबासाहब अंबेडकर जी इन्होंने 14 अक्तूबर 1956 को नागपूर में भदन्त चंद्रमणी के हाथों बौद्ध धम्म क दिक्षा ली थी और खुद अपने हाथों अपने लाखों अनुयायी को बौद्ध धम्म की दिक्षा दी थी। उस वक्त बाबासाहब अंबेडकर जी इन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दी थी। फिल्म में 14 अक्तूबर 1956 का दृश्य तो दिखाया गया किन्तु बाबासाहब अंबेडकर जी इन्होंने जो 22 प्रतिज्ञाएँ दी थी वर पुरी नही दिखाई खासकर पहली 9 प्रतिज्ञाएँ जो हिन्दू धर्म के खिलाफ थी।
जब्बार पटेल की 'डाॅ.बाबासाहब अंबेडकर' यह हिन्दी फिल्म सिर्फ एक मनोरंजन हैं। इसमें ऐसा कुछ खास नही जिससे हमे कुछ सिखने को मिले और इसमे खास बात तो यह हैं की इस फिल्म में बाबासाहब अंबेडकर जी के जिवन के सच्चे पहलू और संघर्ष नही दिखाया गया। उल्टा बाबासाहब अंबेडकर जी इनको खलनायक साबित करने की कोशिश की गई थी।


