Monday, January 18, 2016

बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। ..बुद्धकथाएँ

बुद्ध का धम्मं !!बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बीच में बुद्ध का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुद्ध धम्मं को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए।
बुद्ध कहते है, मानने से नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुद्ध का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुद्धी पर का भरोसा होगा। अगर बुद्धी में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।
🌐मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे के सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीचे सब तरह का झूठ चलता है। धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है। क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुद्ध ने कहा,तोडो विश्वास, छोडो विश्वास. सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.
🌐बुद्ध कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है । क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा? यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक। बुध्द ने कहा ‘अत्त दीप भव’ ! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रोना मत। मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है। मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है। फिरतुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।
🌐बुद्ध कहते है, संदेह करो, बुद्ध का धम्मं वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोक मानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुद्ध के अनुकूल होता जाएगा। जैसे जैसे लोग सोचने और विचार करने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुद्ध की बात लोगो के करीब आने लगेगी।
🌐जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है। जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुद्ध का आदर रोज बढ़ रहा है। बुद्ध बिना लड़े जित रहे है। क्योकि बुद्ध कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यहविज्ञान का सूत्र है।
🌐सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है। बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, बस इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुद्ध तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वहा कोई जगह नहीं होती। बुद्ध कहते है, ज्ञान तो मिलता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलता है, पिघलता है, तड़पता है। जो व्यर्थ है जल जाता है, सार्थक बचता है। सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो,तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?
gulami dharm ishwar
🌐बुद्ध कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है। संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है। लेकिन बुद्ध संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की,आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो। बुद्ध कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।
🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है। बुद्ध का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था। केवल बुद्ध ही बुध्दिवादी थे। उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी। तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो। ऐसी श्रध्दा नपुंसकता के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना। यह तो भयभितता है। डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कांपती हो। इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है,लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।
🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो। जहॉ संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय्य अवस्था है, इसकी पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?
🌐बुद्ध ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुद्ध ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुद्ध ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुद्ध ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है। बुद्ध उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओं में नहीं, धारणाओं में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालों में नहीं।
🌐बुद्ध ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुद्ध ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगताहै। आत्मा शब्द का मतलब यह हुआ की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुआ है, रुका हुआ है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है। तो जो मौजूद ही ही है, वह वस्तुतः जड है।
🌐बुद्ध ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के सिवाय तुम मे और कोई नहीं है।

Monday, January 11, 2016

गोलमेज सम्मेलन 1930 में दिये गयेभाषण की ब्रिटिशप्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने प्रंशसा

आज हम उस दौर की बात कर रहे है जिसमें डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में दिये गयेभाषण की ब्रिटिशप्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने प्रंशसा की तथा ’’दी इंडियन डेली मेल ‘‘ ने डॉ. अम्बेडकर के भाषण को सम्पूर्ण सम्मेलन का सर्वोतम भाषण बताया तथा अंग्रेजी समाचार पत्रों ने भी डॉ. अम्बेडकर के भाषण को प्रमुखता से छापा था,डॉ. अम्बेडकर के भाषण की खास विशेषता रही की उनकी वाणीमें एक मात्र थी , वक्तव्य नही जिसमें धुआँ का नाम नही , लपलपाती सुर्ख लपटे थी ।इससे प्रभावित होकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, डॉ. अम्बेडकर के तर्को, उनकी व्याख्या और स्पष्ट अभिव्यक्ति के प्रंशसक हो गए । गांधी जी के प्रति उनका सम्मोहन मिट सा गया था ।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
1931 मे जब गांधी जी ने यह कहा की कांग्रेस ही सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करती है तथा वह अछूतों का भी प्रतिनिधित्व करती है,
उसी समय तपाक से डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी की बात को काटते हुए स्पष्ट शब्दों मे कहा की ‘कांग्रेस और गांधी का यह दावा कि वे मुझसे ज्यादा दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो एकदम झूठा और गलत है ।’
यह तमाम उन झूठें बयानो मे से एक है जो अक्सर गैर जिम्मेवार लोग देते है ।
मिस्टर चेयरमेन, मैं भारत के सम्पूर्ण अछूतों का प्रतिनिधित्व करता हॅूं ।
इतना कहते ही पूरा सदन हक्का-बक्का रह गया, पूरे सदन मे डॉ. अम्बेडकर की आवाज देर तक गूंजती रही ।
अंत मे द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के चेयरमेन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, ने डॉ. अम्बेडकर को उनकी शानदार पैरवी के लिए धन्यवाद दिया
और कहा की उन्होने अपने वक्तव्य से सारी स्थिति स्पष्ट कर दी जिसमे सन्देह की कोई गुंजाईश नही रही ।
इसी का परिणाम था कि अंग्रेज सरकार द्वारा घोषित साम्प्रदायिक पंचाट में दलितो के लिए जो अधिकारो की मांग डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखी गई उसे उसी रूप मे स्वीकार कर लिया गया ।
जिसके विरूद्ध गांधी जी ने अनशन किया परिणामस्वरूप पूना पेक्ट समझोता हुआ ।
द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के समापन अवसर पर ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने एक पार्टी का आयोजन किया जिसमे सभी राजनेता मेहमान शरीक हुए
इसमे डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम से बातचीत करते हुए उनके प्रश्नों का उत्तर दिया ।
दूर से गांधी जी नंगे सिर, लंगोटी लगाए और चप्पल पहने हुए इस दृश्य को देख रहे थे कि सम्राट जार्ज पंचम भीमराव अम्बेडकर के प्रति गहरी दिलचस्पी लेने लगे है ।
भीमराव अम्बेडकर ने अछूतों की अति दयनीय और भंयकर उपेक्षित स्थिति का वर्णन जिन शब्दों और जिस ढंग से किया, उससे सम्राट जार्ज पंचम का हदय दहल गया था ।
उनकी ऑंखों में लाली उतर आई थी । उनके अधर कॉप गए थे ।
‘क्या अछूत सिर पर मैला उठाकर चलते हैं? ‘‘जी हॉं, सम्राट!
‘‘क्या उन्हें अछूत होने के लिए अपनी पहचान रखना जरूरीहै?
‘ जार्ज पंचम ने प्रश्न किया ।जी , सम्राट!
‘‘वे हिन्दू हैं?‘ साश्चर्य जार्ज पंचम ने पूछा ।
‘जी हॉं सम्राट , वे हिंदू हैं ‘ लेकिन वे उनके मंदिरों में नहीं जा सकते,
उनके तालाब, कुओं आदि से पानी नहीं भर सकते , उनकी किसी चीजो को नहीं छू सकते ‘ भीमराव अम्बेडकर ने धीरे - धीरे बताया ।
‘क्यों ?
‘ जार्ज पंचम का मुहॅ खुला रह गया ।क्योकि वे अछूत हैं ...........
मैं भी उनमें से एक हूँ - भीमराव अम्बेडकर ने कहा ।
‘आप तो विद्वान है.... आपका यहॉ बहुत नाम हुआ है । हमारे लोगों ने आपको डाक्टर अम्बेडकर, बहुत पसंद किया है ।
फिर भी....!‘ जार्ज पंचम आगे कहते -कहते रूक गए ।
वे सोचने लगे ।मैं भी अछूतों मे से हूँ ।
आपकी सरकार कुछ करे , उनको भी जीने का हक मिले ,
यह प्रार्थना लेकर मैं आया हॅू ।‘
भीमराव अम्बेडकर ने भारी स्वर में कहा ।
‘श्योर.....श्योर.....डाक्टर......
अम्बेडकर !‘ जार्ज पंचम ने सहानुभूतिपूर्ण स्वर में कहा और फिर वे अन्य अतिथियों से घिर गए ।
जय भीम ....
.
दोस्तों इस तरह अंग्रेज़ ने भी
बाबा साहेब का साथ दिया ।

अध्यापक और पप्पू

अध्यापक : बच्चों रामचंद्र ने समुन्द्र पर पुल बनाने का निर्णय
लिया ।
पप्पू : सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ ।
अध्यापक : कहो बेटा ।
पप्पू : रामचन्द्र का पुल बनाने का निर्णय गलत था ।
अध्यापक : कैसे ?
पप्पू : सर उनके पास हनुमान थे जो उड़कर लंका जा सकते थे ।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरुरत ही
नही थी ।
अध्यापक : हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकि
रीछ और वानर तो नही उड़ते थे ।
पप्पू : सर वो हनुमान की पीठ पर बैठकर
जा सकते थे । जब हनुमान पूरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे तो
वानर सेना को भी तो उठाकर ले जा सकते थे ।
अध्यापक : भगवान की लीला पर सवाल
नही उठाया करते ।
पप्पू : वैसे सर एक उपाय और था ।
अध्यापक : क्या ?
पप्पू : सर हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा
बड़ा कर सकते थे जैसे सुरसा के मुँह से निकलने के लिए छोटे हो
गए थे और सूर्य को मुँह में देते समय सूर्य से बड़े तो वो अपने
आकार को भी तो समुन्द्र की चौड़ाई से बड़ा
कर सकते थे और समुन्द्र के ऊपर लेट जाते । सारे बंदर हनुमान
जी की पीठ से गुजरकर लंका
पहुँच जाते और रामचंद्र को भी समुन्द्र
की अनुनय विनय करने की जरुरत
नही पड़ती । वैसे सर एक बात और
पूछूँ ?
अध्यापक : पूछो ।
पप्पू : सर सुना है । समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर
पर राम राम लिखा था जिससे पत्थर पानी पर तैरने लगे
थे ।
अध्यापक : हाँ तो ये सही है ।
पप्पू :सवाल ये है बन्दर भालुओं को पढ़ना लिखना किसने सिखाया
था ?
अध्यापक : हरामखोर बंद कर अपनी बकवास और
मुर्गा बन जा ।😂😂😂

Wednesday, January 6, 2016

"ब्राह्मणवादी" संस्कृति

"ब्राह्मणवादी" संस्कृति
----------------------------
क्या यही आदर्श संस्कृति है ?
@ झुठ की संस्कृति,
@ लूट की संस्कृति,
@ जाति की संस्कृति,
@ विषमता की संस्कृति,
@ भेदभाव की संस्कृति,
@ शोषण की संस्कृति,
@ ऊंच-नींच की संस्कृति,
@ देवतावाद की संस्कृति,
@ अवतारवाद की संस्कृति,
@ श्रध्दा से खेलने की संस्कृति,
@ बेबस देवदासीयों की संस्कृति,
@ धर्म स्थलों में लुंट की संस्कृति,
@ गुरु घण्टालो की संस्कृति,
@ अश्लीलता की संस्कृति,
@ नंगे नाच-गाने की संस्कृति,
@ नंगे बाबाओं की संस्कृति,
@ कामवासना की संस्कृति,
@ बलात्कारीयों की संस्कृति,
@ भोन्दु बाबाओं और अम्माओं की संस्कृति,
@ अंधश्रध्दा की संस्कृति,
@ अनैतिक संबंधों की संस्कृति,
@ प्रदूषण फैलाने वाले त्यौहारों की संस्कृति,
@ अश्लील कृत्य की संस्कृति,
@ मदिरापान की संस्कृति,
@ गांजे के नंशे की संस्कृति,
@ खोपड़ी में दारु पीने की संस्कृति,
@ पत्थर पर दूध बहाने की संस्कृति,
@ भोग के नाम पर अन्न को जाया करने की संस्कृति,
@ भूखे को भूखे मारने की संस्कृति,
@ मृतक को पानी पिलाने की संस्कृति,
@ जीवित को प्यासे मारने की संस्कृति,
@ पापी मन को पानी से धोने की संस्कृति,
@ रंगीलो की संस्कृति,
@ बहु पत्नीत्व की संस्कृति,
@ स्त्री को दासी बनाने की संस्कृति,
@ स्त्री शोषण की संस्कृति,
@ पत्नी को जुएँ में दाँव पर लगाने की संस्कृति,
@ दहेज की संस्कृति,
@ बेटी को जन्म से पहले ही मारने की संस्कृति,
@ चमत्कारों की संस्कृति,
@ लाचारों को लाचार बनाने वाली संस्कृति,
@ बेबस को और बेबस बनाने वाली संस्कृति,
@ निर्धनों को और निर्धन बनाने वाली संस्कृति,
@ धनवानों को और धनवान बनाने वाली संस्कृति... !!!
क्या ऐसे संस्कृति से आदर्श समाज का निर्माण होगा.??
क्या ऐसे संस्कृति से भारत देश महान होगा...??
क्या ऐसे संस्कृति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवित रहेगा.. ???
क्या ऐसे संस्कृति से समाज में "समता"आयेगी...??
आप भी विचार कीजिए...

मास्टर जी, बालक , इम्तिहान और इतिहास

एक बार एक क्लास में मास्टर जी ने सोचा
की आज बच्चो की इम्तिहान लिया जाए
की वो राष्ट्रवादी तथ्यों को कितना जानते व
समझते हैं,
इसलिए उन्होंने पहली बेंच से सवाल का आरम्भ किया
पहले लड़के से पूछा :
भारत की एक समस्या बताओ ?
लड़के ने कहा : गरीबी ….
दुसरे लड़के से भी वही सवाल :
भारत की एक समस्या बताओ ?
दुसरे लड़के ने कहा : आतंकवाद
तीसरे लड़के से पूछा :
भारत की एक समस्या बताओ?
तीसरे ने कहा :
भ्रष्टाचार। इस तरह वो हर एक लड़के से सवाल पूछते गए सबने
ने अलग अलग जवाब दिए कोई कहता पाकिस्तान …
कोई अशिक्षा …
कोई कहता कन्या भ्रूण हत्या ..
कोई कहता बेरोजगारी ….
कोई कहता नेता, इस तरह से क्रम आगे बढ़ता गया| कक्षा में कुल
101 विध्यार्थी थे ….
अब तक मास्टर जी कुल 100 से वही
सवाल पूछ चुके थे और सभी 100 छात्रों ने अलग
अलग समस्या बताई किसी ने बड़ी
बड़ी समस्या बताई तो किसी ने
छोटी लेकिन सब ने अलग अलग समस्या बताई अब
बारी थी छात्र नम्बर 101 की
……
जो की अनुसूचित जाती से था ।
वो हमेशा कक्षा में अव्वल आता था मास्टर जी ने पासा
पलटा मास्टर जी ने उस लड़के की
बुद्धिमता जांचने केलिए सवाल बदला और कहा :
यहाँ जितनो ने जितनी भी समस्या बताई है
सब का निदान बताओ ? इन सभी समस्यों को समाधान
बताओ?
वो बालक तनिक भी नहीं घबराया ..उसने
उलटे मास्टर जी से पूछा मास्टर जी 100
समस्या का एक हल बताऊ या 100 समस्या के 100 हल बताऊ,
अब मास्टर जी चौक पड़े ….वो सोचने लगे
इतनी सारी समस्या का एक हल कैसे हो
सकता हैं उनकी उतेजना बढती जा
रही थी
मास्टर जी ने कहा :
100 समस्या का एक हल संभव हैं क्या ?
बालक ने कहा : बिलकुल हैं …
मास्टर जी : बताओ ज़रा………….
आपको पता है बालक ने क्या कहा बालक ने कहा :
मास्टर जी .इन सब समस्या का एक ही
हल हैं और वो है इस देश से जातिवाद को ख़त्म कर दो सब
ठीक हो जायेगा,
क्योंकि इस देश में सब अपनी जाती के लिए
जीते-मरते हैं देश के लिए नहीं...
“जिस समाज का इतिहास नहीं होता,
वह समाज कभी भी शासक
नहीं बन पाता…
क्यूकी,
इतिहास से “प्रेरणा” मिलती है,
प्रेरणा से “जागृति” आती है,
जागृति से “सोच” बनती है,
सोच से “ताकत”:बनती है,
ताकत से “शक्ति” बनती है,
और शक्ति से “शासक” बनता है…!!”
पता है उस बच्चे का क्या नाम था
जी हा सही सोचा
– डा. भीम राव अम्बेडकर
*************************************

Sunday, January 3, 2016

भीमा कोरेगांव का युद्ध और पेशवा

फिल्म में बाजीराव मस्तानी के करनामे तो आप लोग देख लिये .....
लेकिन अपना भी इतिहास जान लीजिये ...
बाजीराव - मस्तानी देखने वाले भले ही पेशवा बाजीराव के कारनामे देख के अतीत में पेशवाओ के मुरीद हो जाएँ परन्तु यह अकाट्य सत्य है की पेशवाओ का राज अछूतो के लिए सबसे कष्टकारी और अपमानजनक राज था ।
पेशवाओ के राज में ब्राह्मणवाद इतना चरम पर था की अछूतो को सड़क पर चलने तक की अनुमति नहीं थी , यदि कोई अछूत सड़क पर चलता तो उसको आगे गले में हांड़ी लटकानी पड़ती थी ताकि उसका थूक जमीन पर न गिरे और पीछे झाड़ू लटकानी पड़ती थी ताकि उसके पदचिन्हो पर किसी ब्राह्मण का पैर न पड़े और वह अपवित्र न हो ।
पेशवा के ऐसे ही अमानवीय अत्याचारो से तंग आके महारास्ट्र के महारो ने अंग्रेजी सेना में भर्ती होके पेशवा बाजीराव को बुरी तरह हरा दिया था ।ये महारो का ही पराक्रम था की वे केवल 500 थे जबकि बाजीराव के 28000 सैनिक , पर केवल 500 महार अछूतो ने बाजीराव के 28000सैनिको को बुरी तरह धूल छटा दी थी ।
पेशवा बाजीराव का जनवरी 1818 में ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ कोरेगांव के पास अंतिम युद्ध हुआ । पेशवा की सेना में 28000 सैनिक थे और कंपनी की सेना में 500 पैदल और 50 घुड़सवार जिसमें अधिकतर महार थे । कंपनी की महार सेना ने पेशवा बाजीराव की सेना की धज्जियां उड़ा दीं । कोरेगांव का युद्ध स्मारक अछूत महार जाति के अद्भुत पराक्रम का परिचायक है । पेशवा ने अपने शासन काल में अछूतो पर जो अत्याचार किये थें , उनकी अछूत महारो में भयानक प्रतिक्रिया का कोरेगांव एक अद्भुत उदहारण है । इस युद्ध में पेशवा बाजीराव को पकड़ कर कंपनी की सेना ने मार कर पेशवा राज्य समाप्त कर उस पर अधिकार कर लिए और अछूतो को बहुत हद तक राहत मिली
‘भीमा नदी’ के तट पर बसा
गाँव
‘भीमा – कोरेगांव’
पुणे ( महाराष्ट्र )
की कहानी
01 जनवरी 1818 का
‘ठंडा’ दिन
दो ‘सेनाएं’
आमने - सामने
28000 सैनिकों सहित
‘पेशवा बाजीराव – ( II ) 2’
के विरूद्ध
‘बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री’ के
500 ‘महार’ सैनिक
‘ब्राह्मण’ राज बचाने की
फिराक में ‘पेशवा’
और
दूसरी तरफ
‘पेशवाओं’ के पशुवत
‘अत्याचारों’ का
‘बदला’ चुकाने की
‘फिराक’ में
गुस्से से तमतमाए
500 “ महार “
के बीच
घमासान ‘युद्ध’ हुआ
जिसमे
‘ब्रह्मा’ के मुँह से ‘जनित’
( पैदा हुए )
28000 ‘पेशवा’ की
500 महार योद्धाओ
से शर्मनाक ‘पराजय’ हुई
हमारे सिर्फ 500 योद्धाओने
28000 पेश्वाओका
नाश कर दिया
और
ईसके साथ ही
भारत से पेश्वाई खत्म कर दी
ऐसे बहादुर थे हमारे
पुरखे
और
ऐसा हमारा
गौरवशाली ईतिहास है
सब से पहले उन
500 ‘महार’ ( पूर्वजों ) करो
‘नमन’ करो ...
क्यों ... ??
क्योंकी.........
1 ) उस ‘हार’ के बाद, ‘पेशवाई’
खतम हो गयी थी |
2 ) ‘अंग्रेजो’ को इस भारत देश
की ‘सत्ता’ मिली |
3 ) ‘अंग्रेजो’ ने इस भारत देश
में ‘शिक्षण’ का प्रचार
किया, जो ‘हजारो’ सालों
से ‘बहुजन’ समाज के
लिए ‘बंद’ था |
4 ) ‘महात्मा फुले’ पढ़ पाए,
और इस देश की जातीयता
‘समज’ पाऐ |
5 ) अगर ‘महात्मा फुले’ न पढ़
पाते तो ‘शिवाजी महाराज’
की ‘समाधी’ कोण ‘ढूँढ’
निकलते |
6 ) अगर ‘महात्मा फुले’ न ‘पढ़’
पाते, तो ‘सावित्री बाई’
कभी इस देश की प्रथम
‘महिला शिक्षिका’ न बन
सकती थी |
7 ) अगर ‘सावित्री बाई’, न
‘पढ़’ पाई होती तो, इस
देश की ‘महिला’ कभी न
पढ़ पाती |
8 ). ‘शाहू महाराज’,
‘आरक्षण’ कभी न दे पाते
9 ) ‘डॉ. बाबा साहब’, कभी न
‘पढ़’ पाते |
10 ) अगर 1 जनवरी, 1818
को 500 ‘महार’ सैनिकों
ने 28,000 ‘ब्राम्हण’
( पेशवाओं ) को, मार न
डाला होता तो ... !!!
आज हम लोग कहा पे
होते ... ??
आज भी भीमा कोरेगाव में
विजय स्तम्भ खड़ा है
और
उसपे उन हमारे
शुरवीर ,बहादुर
और
वतन परस्त
महार सैनिको
जो उस युद्ध में सहिद हुए थे
उनके नाम
उस पे लिखा हुआ है।
सोचो
28000÷500=56
के हिसाब से
हमारे एक महार सैनिक ने
अकेले ने ही
56 पेशवाओ को
काट डाला था
कहि देखा,सुना या पढ़ा है ?
ऐसे योद्धा के बारे में
नहीं ना ?
क्यों की .....
भारत में ब्राह्मनो का
राज चलता है
और
वे कभी नही चाहते
की हमारे वीरो की कहानी
हम तक पहुचे
[02/01 12:00 PM] +91 98116 10710: जाने पेशवा......कौन ??
महाराष्ट्र में राजा के बाद प्रधानमंत्री के पद को पेशवा कहा जाता था । जो केवल ब्राह्मण प्रजाति के लिए आरक्षित होता था । यदि राजा लड़ने में अक्षम (नाबालिक /बीमार या वॄद्ध ) हो तो पेशवा कुछ समय के किये उनका कार्यभार संभाल लिया करता था । यह पेशवा का पद वंशानुगत नही था । किंतु बालाजी बिश्वनाथ भट्ट ने यह पद अपने वंशजो के लिए वंशानुगत कर खुद राजा बन बैठा और अपने पुत्र बाजीराव पेशवा प्रथम को राजपाठ सौप दिया ।
आओ देखे पेशवाओ की अमानवीय हरकते......
############################
छत्रपति शिवाजी महाराज के "रैयत " के अनुसार राजकार्य के घोर विरोधी पेशवा !!
शिवाजी महाराज को भरे दरबार मे शूद्र कह कर अपमानित करने वाले पेशवा !!
शिवाजी महाराज को शूद्र कह कर उनके राज्याभिषेक नहीं करने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज के विरोध मे यज्ञ करने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज कि हत्या की साजिश करने वाले.....पेशवा ....!!!
शिवाजी ने जिस अफजल खां को बाघनख से चीर दिया था , उस वक्त छत्रपति शिवाजी महाराज को तलवार से वार करने वाला अफजल खान का वकील चाटुकार कुष्णाभास्कर कुलकर्णी....पेशवा !!
संभाजी महाराज को मुगलो से पकडवाने वाले .....पेशवा .....!!!
संभाजी महाराज की "मनुस्मृति" के अनुसार ...मुगलो से हत्या करवाने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज की माँ साहेब जिजाऊ ,शिवपुत्र संभाजी का चरित्र हनन करने/ बदनामी कारक पुस्तक लिखने वाले पेशवा !!
विदेशी लेखक जेम्स लेने को पुणे स्थित भन्डारकर इंस्टीट्यूट मे "शिवाजी द किंग ईन इस्लामिक इंडिया " नामक पुस्तक लिखवाने वाले पेशवा ...!!!
राष्ट्रपिता फूले जी ने जब छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि को खोजा व साफ सफाई करने के बाद शिव जयंती मनाने का निर्णय लिया तो .....
इस "कुनभट" को इतना तव्वज्यो क्यो दे रहे हो... राष्ट्रपिता फूले जी को ऐसी सलाह देने वाला
शिवाजी महाराज को जातिगत सम्बोधन करने वाला ग्रामजोशी पेशवा !!
कुलमी.. कुनबी...कुर्मी जातियों को कुणभट कहकर नाम बिगाडने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवजी के पोते शाहुजी महाराज को शूद्र कहकर उनके के स्नान के समय वैदिक मन्त्रो की जगह पौराणिक मन्त्र पडने वाला पेशवा !!
छत्रपति शाहुजी महाराज को निचले ( शूद्र ) वर्ण का कहकर , महाराज को उनके रसोईघर मे नही आने देने वाला , महाराज को अपमानित करने वाला जातिवाद करने वाला पेशवा ..!!
शिवाजी महाराज के राज्य को नष्ट करने वाले
खत्म करने वाले पेशवा...!!
शिवाजी के द्वारा शुरू किए गये "शिव शक संवत " को बन्द करने वाले पेशवा,...!!!!
"शिव शक संवत " की जगह मुगलो का "फसली शक संवत" शुरू करने वाले मुगलो के गुलाम पेशवा...!!!
अछूतो के गले मे मिटटी का बर्तन व कमर मे झाडू लटकाने वाले अमानविय/जातिवाद/वर्णवादी/दुष्ट पेशवा...!!
महिलाओ को वासना पूर्ति का साधन समझने वाले/कामूक/अन्यायी/ अत्यचारी/दरिन्दे/नाचने वाली/ गाने वाली /मुजरा करने वाली मस्तानी के पीछे अपनी पत्नी को धोखा देने वाले , अपनी प्रजा को धोखा देने वाले
पेशवा
मूलनिवासियो
जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती वह कौम अपने बच्चों का भविष्य निर्माण नहीं कर सकती है
जागो
जागो
जागो
जब मूलनिवासी जागेगा देश का दुश्मन भागेगा...
जय भीम जय प्रबुद्ध भारत

क्या वजूद हैं तेरा , जो इन्सान होकर भी , तु इन्सान नही ।

अज्ञान का असर हैं ,
शिक्षा का ज्ञान नही ।
पत्थरों को पूजता हैं , 
सत्य की पहचान नही ।
मंदीरों में चढावा ,
गरीबों को दान नही ।
कठपुतली बनकर रह गया ,
खुद का ईमान नही ।
डूब गया हैं , दु:ख में ;
सुख में समाधान नही ।
बुद्ध को समझ ले ,
दुसरा कोई वरदान नही ।
वरना -------
जीना भी क्या जीना हैं ,
जब जिने का अरमान नही ।
क्या वजूद हैं तेरा ,
जो इन्सान होकर भी ,
तु इन्सान नही ।