बात बहुत पुरानी है एक राजा था वह बहुत ही अंधविश्वासी और धार्मिक था उसने अपने पुरोहितों से कहा की मुझे देवताओं की पोशाक पहननी है उन्होंने राजा से कहा की देवताओं के पोशाक के लिए एक विशेष पूजा करवानी होगी तब हमें उनकी पोषक मिलेगी !
पूजा कई दिनों चली अंततः वह दिन आया जब उन्हें पोशाक हासिल होनी थी पुरोहितों ने राजा से कहा महाराज पोशाक इस बंद संदूक के अंदर आ चुकी है आप खोल कर इसे पहन लीजिये लेकिन इसके साथ शर्त यह है की पोशाक उसी को दिखेगी जो अपने पिता की वैध संतान होगा !
राजा ने बड़ी उत्सुकता से दरबार के सामने बक्सा खोला ही था की पुरोहित बोल पड़े वाह क्या लिबास हैं लेकिन राजा ने बक्से में देखा तो वो खाली था अब राजा को अपने वैध होने पर संदेह हो गया उसने दरबार के सामने अपनी इज्जत बचाने के लिए पुरोहितों का समर्थन किया कहा वाह जैसा सोचा था ये वस्त्र तो उससे भी बढ़ कर है महामंत्री को भी बक्सा खाली दिखा लेकिन उसे भी हरामी थोड़े ही बनना था उसने भी राजा की बात को दोहरा दिया !
अब बारी थी उन वस्त्रों को पहनने की पुरोहितों के कहने पर राजा ने अपने सारे वस्त्र उतार दिए और देवताओं का वस्त्र धारण किया जो असल में कुछ था ही नहीं अब राजा पूरे दरबार में निवस्त्र खड़ा था और पूरा दरबार उसके उन वस्त्रों की तारीफों के पुल बांध रहा था जो असल में कुछ था ही नहीं !
अब पुरोहितों ने कहा महाराज पूरा नगर आपके वस्त्रों को देखने की उत्सुकता में खड़ा है एक बार उन्हें भी इन वस्त्रो के दिव्य दर्शन करवा दीजिये
अब राजा हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण को निकले पूरे नगर वासियों ने भी पुरोहितों की शर्त सुन रखी थी उन्हें भी वस्त्र वैसे ही दिखा जैसे राजा और मंत्रियों को दिखा था महान राजा की जय जय कार से पूरा शहर गूंज उठा !
एक बच्चा जो अपने पिता के कंधो पर सवार होकर यह तमाशा देखने आया था उसने बड़े मासूमियत से अपने पिता से कहा राजा तो नंगे है आप तो कह रहे थे वे देवताओ के वस्त्र पहन कर आएंगे ?
इतना सुनते ही उस व्यक्ति ने उस बच्चे को कंधे से उतार दिया और उसकी माँ की तरफ घूर कर देखा और कहा अभी घर चल…….
देवताओं के उन वस्त्रों के रूप में हमारी मान्यताये धर्म और संस्कृति हैं और उस बच्चे के रूप में हम सभी नास्तिक लोग ….
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