Thursday, February 4, 2016

खोजे , जिनसे विश्व में देश का नाम रोशन किया हुआ है

भारत के विषमतावादियो की शिकायत है कि आरक्षण की वजह से देश का विकास रुक गया है |
आरक्षण से पहले इन लोगो ने बहुत आविष्कार और खोजे की थी जो कि इस संसार में अन्य कहीं मिलना नामुमकिन है |
आइए जानते है इनकी ऐसी ही कुछ खोजो और अविष्कारों के बारे में
जिनसे इन्होने विश्व में देश का नाम रोशन किया हुआ है ---
१. इनकी सबसे महत्त्वपूर्ण खोज वर्ण व्यवस्था और जातियों की खोज थी | इन्होने मनुष्यों को 6743 से अधिक जातियों में बाँट दिया | इतनी अधिक जातियों की खोज करना क्या कोई आसान काम है ?
सोचिये बेचारों को इतनी अधिक जातियों को खोजने में कितना अधिक परिश्रम करना पड़ा होगा |
२. इनकी दूसरी महत्वपूर्ण खोज ३३ करोड़ देवी-देवताओं की खोज है | ये खोज इन्होने उस समय की, जब देश की कुल आबादी भी ३३ करोड़ नहीं थी|
सोचिये !!
इतने सारे देवी देवताओ की खोज में बेचारों को कितना पसीना बहाना पड़ा होगा ?
अजी रात दिन एक कर दिए होंगे बेचारों ने |
३. आज चाहे वैज्ञानिक अभी तक दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश नहीं कर पाए लेकिन ये लोग बहुत पहले ही ऐसे दो लोकों की तलाश कर चुके हैं जहाँ पर जीवनमौजूद है और वो ग्रह
हैं --
स्वर्ग लोक जहाँ पर अलौकिक शक्तियों के स्वामी देवता निवास करते हैं और नरक लोक |
३. विश्व के देशों ने चाहे कभी भी परमाणु बम,हाइड्रोजन बम जैसे विनाशकारी बमों का निर्माण किया हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही ऐसे ऐसे अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण कर चुके थे जो पूरी सृष्टि का विनाश करने में सक्षम थे | इन्होने उसको नाम दिया ब्रह्मास्त्र |
इन्होने आज तक किसी आक्रमणकारी शत्रुओं के खिलाफ उसका प्रयोग क्यों नहीं किया ये अलग शोध का विषय है|
बाहर से कुछ सौ हजारों की संख्या में आक्रमणकारी आते रहे और इनको ३३ करोड़ शस्त्रधारी देवताओं के साथ धूल चटाते रहे ये अलग बात है |
४. वैज्ञानिक बेशक आज तक मनुष्य की उम्र बढ़ाने और उसको अजर, अमर बनाने की औषधि नहीं खोज पाए हो लेकिन ये अब से कई युगों पहले मनुष्य को अमरता का रसास्वादन करवा चुके है ये अलग बात है इनके द्वारा अमर किये गए अश्वत्थामा जैसे मानव कभी भी देखने को नहीं मिलते हैं |
५. बेशक विश्व में कभी भी आकाशवाणी का प्रसारण भारत मे बाद में हुआ लेकिन ये उससे बहुत पहले ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर चुके थे जिससे किसी युद्ध का आँखों देखा हाल बिना किसी भी कैमरा जैसे यंत्र की मदद के दिव्यदृष्टि के द्वारा किया जा सकता था लेकिन उसके बाद में उसका प्रयोग इन्होने क्यों नहीं किया ये अलग एक विचारणीय प्रश्न है.
६. विश्व का कोई भी देश आज तक सूर्य पर नहीं पहुँच सका है लेकिन ये अबसे पहले सूर्य पर होकर आ चुके हैं।
७. सूर्य को फल की तरह खाया भी जा सकता है ये भी अकेली इनकी ही खोज थी |
८. बेशक राईट बंधुओ को हवाई जहाज के अविष्कार के निर्माण के श्रेय दिया जाता हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही पुष्पक विमान का निर्माण कर चुके थे | उसके बाद इनकी वायुयान निर्माण कला को क्या हुआ ये आज तक रहस्य है |
९. संजीवनी बूटी जैसी चमत्कारिक औषधि भी इन्हीं की खोज थी जिससे किसी भी मृत मनुष्य को जीवित किया जा सकता था लेकिन आज वो औषधि कहाँ हैं ये इनको भी आज तक नहीं पता है |
१०.आज बेशक देश में सूखा पड़ता हो और और लोग पानी को तरसते हो लेकिन ये अब से युगों पहले आकाश में तीर मारकर बारिश करवा सकते थे आज ये उसका प्रयोग क्यों नहीं करते ये भी एक रहस्य है।
११. एक गर्दन पर दस-दस तक सिर और एक कंधे पर हजारों हाथ उग सकते हैं ये भी इनकी ही बुद्धिमता की खोज है |
१२. समुन्द्र यात्रा से मनुष्य गल जाता है ये भी इनकी ही महत्वपूर्ण खोज है |
१३. पशु पक्षियों में भी मानवीय संवेदना होती है और वो भी मानव की भाषा बोल और समझ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज है |
१४. मानव क्लोन बनाने की कला में तो ये सिद्धहस्त थे| अगर किसी मनुष्य के रक्त की बूंदे धरती पर पड़ जाती थी तो जितनी बूंदे धरती पर पड़ती थी उसके उतने ही क्लोन पैदा हो जाते थे |
१५. मानव रक्त भी कोल्ड ड्रिंक और चाय की तरह पिया जा सकता है ये भी इनकी ही महत्त्वपूर्ण खोज थी |
१६. बच्चे बिना औरत मर्द के पैदा भी किये जा सकते है ये भी इनकी ही खोज थी |
ये मानव शिशु छींक कर,
सेब को खाकर,
खीर पीकर,
शरीर के पसीने द्वारा,
पशु पक्षियो के गर्भ द्वारा भी पैदा करवा सकते थे |
१७. वानर-रीछ जैसे जीव भी बिना पंखो के उड़ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी |
१८. एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के स्पर्श से, उसकी छाया से भी भ्रष्ट हो सकता है ये भी इनकी ही खोज थी |
१९. पशु भी मानव
(ST/SC/OBC)
से ज्यादा शुद्ध और पवित्र होता है ये भी इनकी ही खोज थी|
२०. मानव जो
(SC/ST/OBC) हैं उनके स्पर्श से भ्रष्ट हुआ मनुष्य पशुओं का मूत्र पीकर, या मूत्र छिड़ककर पवित्र हो सकता है ये भी इन्ही की खोज थी |
२१. स्त्री और शूद्र दोयम दर्जे के नागरिक है इनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती | इनके कोई अधिकार नहीं होते | इनको अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है ये भी इन्ही की खोज थी |
२२. पूजा-अर्चना और हवन के द्वारा भी बारिश करवाई और रोकी जा सकती है ये भी इन्ही की खोज थी |
२३. अगर किसी स्त्री को एक ही पुरुष में उपयुक्त पति नहीं मिलता है तो वो पांच या उससे अधिक भी आदमियों को अपने पतियों के रूप में स्वीकार कर सकती है ये भी इन्ही की खोज थी|
२४. माता एक औरत को पांच भाइयो के बीच में किसी वस्तु की तरह बाँट सकती है ये भी इन्ही की खोज थी |
२५. अगर किसी औरत का गर्भपात हो जाता है तो उसका भ्रूण नष्ट होने से बचाया जा सकता है और उस भ्रूण को सौ टुकडो में बांटकर सौ या उससे अधिक संताने पैदा की जा सकती हैं ये भी इनकी ही खोजथी |
२६. मानव और जानवर के सिर आपस में बदले जा सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी |
२७. मानव और हाथी का रक्त ग्रुप एक होता है ये भी इनकी ही खोज थी |
२८. चूहे पर बैठकर भी मनुष्य सवारी कर सकता है ये भी इनकी ही खोज थी|
२९. वैज्ञानिक बेशक आज तक किसी मनुष्य का भविष्य बताने में सक्षम न हो लेकिन ये किसी का भी भूत,भविष्य और वर्तमान बताने में सक्षम है |
३०. पृथ्वी, सूर्य,चन्द्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,सोम जैसे गृह भी जीवित प्राणी ही नहीं देवता भी हैं जो किसी का शुभ और अशुभ कर सकते हैं | ये भी इन्ही की खोज थी |
कितनी महान खोजे है इनकी जिनसे विश्व में भारत का नाम रोशन हुआ है लेकिन आरक्षण वालों ने आकर इनकी योग्यता को रोक का रख दिया है|
बेचारे अब ऐसे अविष्कार और खोजें नहीं कर सकते है |
जय भारत !
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Wednesday, February 3, 2016

कुठे पुण्य मिळते

आजची कविता. . . सावित्री समता मंच.
केस अर्पण
करून कुठे पुण्य मिळते,
नारळ अर्पण
करून कुठे भाग्य उजळते,
केस अन् नारळ
विकुनी होतो व्यापार.
सोनं- चांदी अर्पण
करून कुठे काय मिळते.
सोने -चांदीच्या
दागिन्यांचा होतो लिलाव.
काय उपयोग सांग मानवा
अशा या दान धर्माचा ???
कधी शेतक-याला
बियाणं दान देऊन बघा.
कधी निराधार
कन्येचा विवाह लाऊन बघा.
कधी एखाद्या निराधार
बालकाचा पालक होऊन बघा.
कधी एखाद्या
उपाश्याला भरवुन बघा.
कधी एखाद्या
अपंगाला आधार देऊन बघा.
कधी एखाद्या शाळेचा
जीर्णोध्दार करून बघा.
कधी एखाद्या
वृध्दाश्रमास दान करून बघा.
कधी एखाद्या आश्रमातील
निराधारांवर प्रेम करून बघा.
एकदा दान धर्माच्या
व्याख्या बदलून तर बघा !!!
जेव्हा मंदिरात जाणाऱ्या
रांगा वाचनालयात जातील,
तेव्हा भारत
जगात महासत्ता बनेल...
पुस्तक वाचनाने
माणसाचं मस्तक सशक्त होतं...
सशक्त झालेलं मस्तक
कुणाच हस्तक होत नसतं...
आणि हस्तक न झालेलं मस्तक
कुठेही नतमस्तक होत नसतं...!
शाळेचे छत गळके आणि
मंदिराचे छत मात्र सोन्याचे ?
शाळेत आज मुलांना
बसायला साधी फरशी नाही.
आणि
मंदिराला मात्र संगमरवरी ?
शाळेला दोन रुपये देतांना दहा
वेळा चौकश्या करणारा पालक,
मंदिराला दोन हजार देतांना
अजिबात चौकशी करत नाही..
आपला भारत
नक्की महासत्ता होणार ?
पायात घालायची चप्पल
ए सी मधे विकायला ठेवतात,
आणि
भाजीपाला फूटपाथवर...!
आणि म्हणे
आमचा देश कृषी प्रधान..!
आणि
आत्महत्या करतो शेतकरी..
शेकडो
मैल चालतो वारकरी...
अन विठोबाचे
पहिले दर्शन घेतो मुख्यमंत्री..!
वाचा, विचार करा, आणि
पटलं तरच पुढे पाठवा..!

Monday, January 18, 2016

बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। ..बुद्धकथाएँ

बुद्ध का धम्मं !!बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बीच में बुद्ध का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुद्ध धम्मं को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए।
बुद्ध कहते है, मानने से नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुद्ध का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुद्धी पर का भरोसा होगा। अगर बुद्धी में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।
🌐मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे के सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीचे सब तरह का झूठ चलता है। धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है। क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुद्ध ने कहा,तोडो विश्वास, छोडो विश्वास. सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.
🌐बुद्ध कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है । क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा? यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक। बुध्द ने कहा ‘अत्त दीप भव’ ! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रोना मत। मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है। मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है। फिरतुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।
🌐बुद्ध कहते है, संदेह करो, बुद्ध का धम्मं वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोक मानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुद्ध के अनुकूल होता जाएगा। जैसे जैसे लोग सोचने और विचार करने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुद्ध की बात लोगो के करीब आने लगेगी।
🌐जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है। जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुद्ध का आदर रोज बढ़ रहा है। बुद्ध बिना लड़े जित रहे है। क्योकि बुद्ध कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यहविज्ञान का सूत्र है।
🌐सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है। बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, बस इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुद्ध तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वहा कोई जगह नहीं होती। बुद्ध कहते है, ज्ञान तो मिलता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलता है, पिघलता है, तड़पता है। जो व्यर्थ है जल जाता है, सार्थक बचता है। सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो,तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?
gulami dharm ishwar
🌐बुद्ध कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है। संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है। लेकिन बुद्ध संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की,आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो। बुद्ध कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।
🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है। बुद्ध का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था। केवल बुद्ध ही बुध्दिवादी थे। उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी। तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो। ऐसी श्रध्दा नपुंसकता के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना। यह तो भयभितता है। डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कांपती हो। इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है,लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।
🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो। जहॉ संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय्य अवस्था है, इसकी पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?
🌐बुद्ध ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुद्ध ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुद्ध ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुद्ध ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है। बुद्ध उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओं में नहीं, धारणाओं में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालों में नहीं।
🌐बुद्ध ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुद्ध ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगताहै। आत्मा शब्द का मतलब यह हुआ की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुआ है, रुका हुआ है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है। तो जो मौजूद ही ही है, वह वस्तुतः जड है।
🌐बुद्ध ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के सिवाय तुम मे और कोई नहीं है।

Monday, January 11, 2016

गोलमेज सम्मेलन 1930 में दिये गयेभाषण की ब्रिटिशप्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने प्रंशसा

आज हम उस दौर की बात कर रहे है जिसमें डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रथम गोलमेज सम्मेलन 1930 में दिये गयेभाषण की ब्रिटिशप्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने प्रंशसा की तथा ’’दी इंडियन डेली मेल ‘‘ ने डॉ. अम्बेडकर के भाषण को सम्पूर्ण सम्मेलन का सर्वोतम भाषण बताया तथा अंग्रेजी समाचार पत्रों ने भी डॉ. अम्बेडकर के भाषण को प्रमुखता से छापा था,डॉ. अम्बेडकर के भाषण की खास विशेषता रही की उनकी वाणीमें एक मात्र थी , वक्तव्य नही जिसमें धुआँ का नाम नही , लपलपाती सुर्ख लपटे थी ।इससे प्रभावित होकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, डॉ. अम्बेडकर के तर्को, उनकी व्याख्या और स्पष्ट अभिव्यक्ति के प्रंशसक हो गए । गांधी जी के प्रति उनका सम्मोहन मिट सा गया था ।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
1931 मे जब गांधी जी ने यह कहा की कांग्रेस ही सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करती है तथा वह अछूतों का भी प्रतिनिधित्व करती है,
उसी समय तपाक से डॉ. अम्बेडकर ने गांधी जी की बात को काटते हुए स्पष्ट शब्दों मे कहा की ‘कांग्रेस और गांधी का यह दावा कि वे मुझसे ज्यादा दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो एकदम झूठा और गलत है ।’
यह तमाम उन झूठें बयानो मे से एक है जो अक्सर गैर जिम्मेवार लोग देते है ।
मिस्टर चेयरमेन, मैं भारत के सम्पूर्ण अछूतों का प्रतिनिधित्व करता हॅूं ।
इतना कहते ही पूरा सदन हक्का-बक्का रह गया, पूरे सदन मे डॉ. अम्बेडकर की आवाज देर तक गूंजती रही ।
अंत मे द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के चेयरमेन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘रैम्जे‘ मैकडोनाल्ड, ने डॉ. अम्बेडकर को उनकी शानदार पैरवी के लिए धन्यवाद दिया
और कहा की उन्होने अपने वक्तव्य से सारी स्थिति स्पष्ट कर दी जिसमे सन्देह की कोई गुंजाईश नही रही ।
इसी का परिणाम था कि अंग्रेज सरकार द्वारा घोषित साम्प्रदायिक पंचाट में दलितो के लिए जो अधिकारो की मांग डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखी गई उसे उसी रूप मे स्वीकार कर लिया गया ।
जिसके विरूद्ध गांधी जी ने अनशन किया परिणामस्वरूप पूना पेक्ट समझोता हुआ ।
द्वितिय गोलमेज सम्मेलन के समापन अवसर पर ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने एक पार्टी का आयोजन किया जिसमे सभी राजनेता मेहमान शरीक हुए
इसमे डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम से बातचीत करते हुए उनके प्रश्नों का उत्तर दिया ।
दूर से गांधी जी नंगे सिर, लंगोटी लगाए और चप्पल पहने हुए इस दृश्य को देख रहे थे कि सम्राट जार्ज पंचम भीमराव अम्बेडकर के प्रति गहरी दिलचस्पी लेने लगे है ।
भीमराव अम्बेडकर ने अछूतों की अति दयनीय और भंयकर उपेक्षित स्थिति का वर्णन जिन शब्दों और जिस ढंग से किया, उससे सम्राट जार्ज पंचम का हदय दहल गया था ।
उनकी ऑंखों में लाली उतर आई थी । उनके अधर कॉप गए थे ।
‘क्या अछूत सिर पर मैला उठाकर चलते हैं? ‘‘जी हॉं, सम्राट!
‘‘क्या उन्हें अछूत होने के लिए अपनी पहचान रखना जरूरीहै?
‘ जार्ज पंचम ने प्रश्न किया ।जी , सम्राट!
‘‘वे हिन्दू हैं?‘ साश्चर्य जार्ज पंचम ने पूछा ।
‘जी हॉं सम्राट , वे हिंदू हैं ‘ लेकिन वे उनके मंदिरों में नहीं जा सकते,
उनके तालाब, कुओं आदि से पानी नहीं भर सकते , उनकी किसी चीजो को नहीं छू सकते ‘ भीमराव अम्बेडकर ने धीरे - धीरे बताया ।
‘क्यों ?
‘ जार्ज पंचम का मुहॅ खुला रह गया ।क्योकि वे अछूत हैं ...........
मैं भी उनमें से एक हूँ - भीमराव अम्बेडकर ने कहा ।
‘आप तो विद्वान है.... आपका यहॉ बहुत नाम हुआ है । हमारे लोगों ने आपको डाक्टर अम्बेडकर, बहुत पसंद किया है ।
फिर भी....!‘ जार्ज पंचम आगे कहते -कहते रूक गए ।
वे सोचने लगे ।मैं भी अछूतों मे से हूँ ।
आपकी सरकार कुछ करे , उनको भी जीने का हक मिले ,
यह प्रार्थना लेकर मैं आया हॅू ।‘
भीमराव अम्बेडकर ने भारी स्वर में कहा ।
‘श्योर.....श्योर.....डाक्टर......
अम्बेडकर !‘ जार्ज पंचम ने सहानुभूतिपूर्ण स्वर में कहा और फिर वे अन्य अतिथियों से घिर गए ।
जय भीम ....
.
दोस्तों इस तरह अंग्रेज़ ने भी
बाबा साहेब का साथ दिया ।

अध्यापक और पप्पू

अध्यापक : बच्चों रामचंद्र ने समुन्द्र पर पुल बनाने का निर्णय
लिया ।
पप्पू : सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ ।
अध्यापक : कहो बेटा ।
पप्पू : रामचन्द्र का पुल बनाने का निर्णय गलत था ।
अध्यापक : कैसे ?
पप्पू : सर उनके पास हनुमान थे जो उड़कर लंका जा सकते थे ।
तो उनको पुल बनाने की कोई जरुरत ही
नही थी ।
अध्यापक : हनुमान ही तो उड़ना जानते थे बाकि
रीछ और वानर तो नही उड़ते थे ।
पप्पू : सर वो हनुमान की पीठ पर बैठकर
जा सकते थे । जब हनुमान पूरा पहाड़ उठाकर ले जा सकते थे तो
वानर सेना को भी तो उठाकर ले जा सकते थे ।
अध्यापक : भगवान की लीला पर सवाल
नही उठाया करते ।
पप्पू : वैसे सर एक उपाय और था ।
अध्यापक : क्या ?
पप्पू : सर हनुमान अपने आकार को कितना भी छोटा
बड़ा कर सकते थे जैसे सुरसा के मुँह से निकलने के लिए छोटे हो
गए थे और सूर्य को मुँह में देते समय सूर्य से बड़े तो वो अपने
आकार को भी तो समुन्द्र की चौड़ाई से बड़ा
कर सकते थे और समुन्द्र के ऊपर लेट जाते । सारे बंदर हनुमान
जी की पीठ से गुजरकर लंका
पहुँच जाते और रामचंद्र को भी समुन्द्र
की अनुनय विनय करने की जरुरत
नही पड़ती । वैसे सर एक बात और
पूछूँ ?
अध्यापक : पूछो ।
पप्पू : सर सुना है । समुन्द्र पर पुल बनाते समय वानरों ने पत्थर
पर राम राम लिखा था जिससे पत्थर पानी पर तैरने लगे
थे ।
अध्यापक : हाँ तो ये सही है ।
पप्पू :सवाल ये है बन्दर भालुओं को पढ़ना लिखना किसने सिखाया
था ?
अध्यापक : हरामखोर बंद कर अपनी बकवास और
मुर्गा बन जा ।😂😂😂

Wednesday, January 6, 2016

"ब्राह्मणवादी" संस्कृति

"ब्राह्मणवादी" संस्कृति
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क्या यही आदर्श संस्कृति है ?
@ झुठ की संस्कृति,
@ लूट की संस्कृति,
@ जाति की संस्कृति,
@ विषमता की संस्कृति,
@ भेदभाव की संस्कृति,
@ शोषण की संस्कृति,
@ ऊंच-नींच की संस्कृति,
@ देवतावाद की संस्कृति,
@ अवतारवाद की संस्कृति,
@ श्रध्दा से खेलने की संस्कृति,
@ बेबस देवदासीयों की संस्कृति,
@ धर्म स्थलों में लुंट की संस्कृति,
@ गुरु घण्टालो की संस्कृति,
@ अश्लीलता की संस्कृति,
@ नंगे नाच-गाने की संस्कृति,
@ नंगे बाबाओं की संस्कृति,
@ कामवासना की संस्कृति,
@ बलात्कारीयों की संस्कृति,
@ भोन्दु बाबाओं और अम्माओं की संस्कृति,
@ अंधश्रध्दा की संस्कृति,
@ अनैतिक संबंधों की संस्कृति,
@ प्रदूषण फैलाने वाले त्यौहारों की संस्कृति,
@ अश्लील कृत्य की संस्कृति,
@ मदिरापान की संस्कृति,
@ गांजे के नंशे की संस्कृति,
@ खोपड़ी में दारु पीने की संस्कृति,
@ पत्थर पर दूध बहाने की संस्कृति,
@ भोग के नाम पर अन्न को जाया करने की संस्कृति,
@ भूखे को भूखे मारने की संस्कृति,
@ मृतक को पानी पिलाने की संस्कृति,
@ जीवित को प्यासे मारने की संस्कृति,
@ पापी मन को पानी से धोने की संस्कृति,
@ रंगीलो की संस्कृति,
@ बहु पत्नीत्व की संस्कृति,
@ स्त्री को दासी बनाने की संस्कृति,
@ स्त्री शोषण की संस्कृति,
@ पत्नी को जुएँ में दाँव पर लगाने की संस्कृति,
@ दहेज की संस्कृति,
@ बेटी को जन्म से पहले ही मारने की संस्कृति,
@ चमत्कारों की संस्कृति,
@ लाचारों को लाचार बनाने वाली संस्कृति,
@ बेबस को और बेबस बनाने वाली संस्कृति,
@ निर्धनों को और निर्धन बनाने वाली संस्कृति,
@ धनवानों को और धनवान बनाने वाली संस्कृति... !!!
क्या ऐसे संस्कृति से आदर्श समाज का निर्माण होगा.??
क्या ऐसे संस्कृति से भारत देश महान होगा...??
क्या ऐसे संस्कृति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण जीवित रहेगा.. ???
क्या ऐसे संस्कृति से समाज में "समता"आयेगी...??
आप भी विचार कीजिए...

मास्टर जी, बालक , इम्तिहान और इतिहास

एक बार एक क्लास में मास्टर जी ने सोचा
की आज बच्चो की इम्तिहान लिया जाए
की वो राष्ट्रवादी तथ्यों को कितना जानते व
समझते हैं,
इसलिए उन्होंने पहली बेंच से सवाल का आरम्भ किया
पहले लड़के से पूछा :
भारत की एक समस्या बताओ ?
लड़के ने कहा : गरीबी ….
दुसरे लड़के से भी वही सवाल :
भारत की एक समस्या बताओ ?
दुसरे लड़के ने कहा : आतंकवाद
तीसरे लड़के से पूछा :
भारत की एक समस्या बताओ?
तीसरे ने कहा :
भ्रष्टाचार। इस तरह वो हर एक लड़के से सवाल पूछते गए सबने
ने अलग अलग जवाब दिए कोई कहता पाकिस्तान …
कोई अशिक्षा …
कोई कहता कन्या भ्रूण हत्या ..
कोई कहता बेरोजगारी ….
कोई कहता नेता, इस तरह से क्रम आगे बढ़ता गया| कक्षा में कुल
101 विध्यार्थी थे ….
अब तक मास्टर जी कुल 100 से वही
सवाल पूछ चुके थे और सभी 100 छात्रों ने अलग
अलग समस्या बताई किसी ने बड़ी
बड़ी समस्या बताई तो किसी ने
छोटी लेकिन सब ने अलग अलग समस्या बताई अब
बारी थी छात्र नम्बर 101 की
……
जो की अनुसूचित जाती से था ।
वो हमेशा कक्षा में अव्वल आता था मास्टर जी ने पासा
पलटा मास्टर जी ने उस लड़के की
बुद्धिमता जांचने केलिए सवाल बदला और कहा :
यहाँ जितनो ने जितनी भी समस्या बताई है
सब का निदान बताओ ? इन सभी समस्यों को समाधान
बताओ?
वो बालक तनिक भी नहीं घबराया ..उसने
उलटे मास्टर जी से पूछा मास्टर जी 100
समस्या का एक हल बताऊ या 100 समस्या के 100 हल बताऊ,
अब मास्टर जी चौक पड़े ….वो सोचने लगे
इतनी सारी समस्या का एक हल कैसे हो
सकता हैं उनकी उतेजना बढती जा
रही थी
मास्टर जी ने कहा :
100 समस्या का एक हल संभव हैं क्या ?
बालक ने कहा : बिलकुल हैं …
मास्टर जी : बताओ ज़रा………….
आपको पता है बालक ने क्या कहा बालक ने कहा :
मास्टर जी .इन सब समस्या का एक ही
हल हैं और वो है इस देश से जातिवाद को ख़त्म कर दो सब
ठीक हो जायेगा,
क्योंकि इस देश में सब अपनी जाती के लिए
जीते-मरते हैं देश के लिए नहीं...
“जिस समाज का इतिहास नहीं होता,
वह समाज कभी भी शासक
नहीं बन पाता…
क्यूकी,
इतिहास से “प्रेरणा” मिलती है,
प्रेरणा से “जागृति” आती है,
जागृति से “सोच” बनती है,
सोच से “ताकत”:बनती है,
ताकत से “शक्ति” बनती है,
और शक्ति से “शासक” बनता है…!!”
पता है उस बच्चे का क्या नाम था
जी हा सही सोचा
– डा. भीम राव अम्बेडकर
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